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अमृत वाणी

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गुरु की वाणी   अमृत वाणी "क्यों दुनिया बसाई, जब पर्दा ही रखना था? प्रिय से पर्दा तुझे शोभा देता है?" स्रोत   विजया डालमिया राष्ट्रीय संयोजिका, महिला लेखिका प्रकोष्ठ, उलझन सुलझन व्याख्या यह वाणी साधक को आत्मचिंतन के गहन आयामों में ले जाती है। यहाँ "पर्दा" केवल वस्त्र या बाहरी आवरण नहीं, बल्कि अहंकार, संकोच, अज्ञान, द्वैत और मन के उन सभी आवरणों का प्रतीक है जो जीव और उसके प्रियतम—परमात्मा—के मध्य दूरी उत्पन्न करते हैं। जब सृष्टि की रचना ही प्रेम, मिलन और आत्मबोध के लिए हुई है, तब उस परम प्रिय से स्वयं को छिपाना कैसा? जिसने हमें जीवन, चेतना और प्रेम का वरदान दिया, उसी के सामने कृत्रिमता, छल और आवरण किसलिए? सच्ची भक्ति में कोई पर्दा नहीं होता; वहाँ केवल समर्पण, सहजता और निष्कपट प्रेम होता है। गुरुवाणी का संदेश है कि जब तक मन के पर्दे नहीं हटेंगे, तब तक परम सत्य का साक्षात्कार संभव नहीं। इसलिए अपने भीतर के भय, संकोच, अहंकार और भ्रम के सभी आवरण हटाकर प्रेमस्वरूप ईश्वर के सम्मुख पूर्णतः समर्पित हो जाना ही साधना का वास्तविक मार्ग है। भावार्थ जिस दिन साधक अपने और परमात्मा के...